पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता क्या है

जलवायु परिवर्तन और आतंकवाद की गणना विश्व की दो सबसे बड़ी चुनौतियों में होती है | जलवायु परिवर्तन की चुनौती का सामना करने के लिए वैश्विक प्रयासों की सुरुआत व्यवस्थित रूप से 1992 से मानी जाती है | जब रियों में संपन हुई पृथ्वी सम्मेनल में जलवायु परिवर्तन की चुनौती पर विश्व का ध्यान खिंचा गया तथा इसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वैश्विक प्रयसो को एक नई व् व्यवस्थित दिशा देने के लिए जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का फ्रेमवर्क अभिसमय  (United Nations Framework Convention on Climate Change- UNFCCC)

पारित किया यह एक अंतराष्ट्री संधि अथवा कानून है जिसमे अन्य बातो के अतरिक्त जलवायु परिवर्तन के मुख्य कारण के रूप में वैश्विक तापमान को अधोगिक युग के आरम्भ से 2 प्रतिशत तक सिमित करने तथा इसके लिए विश्व स्तर पर देश के बिच निरंतर वार्षिक सम्मेनल की व्यवस्था की गई | इन सम्मेनल को Conference of Parties-COP कहा जाता है, जो वार्षिक आधार पर नियमित रूप से आयोजित किया जाता है | 2018 के अन्त तक 24 सम्मेनल किये जा चुके है |

पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता क्या है ?

पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता , जलवायु परिवर्तन की चुनौती के समाधान की दिशा में मील का पत्थर है . इस समझौते पर पेरिस में आयोजित 21 वीं कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज में 2015 में सहमति बनी थी . ये जलवायु परिवर्तन वार्ताएँ 30 नवम्बर -11 दिसम्बर , 2016 को पेरिस में सम्पन्न हुई थीं इन वार्ताओं में यूरोपीय संघ के अतिरिक्त 195 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था इस समझौते में 29 धाराएँ हैं . यह समझौता 2020 में लागू होगा पेरिस समझौते की मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:-

 

जलवायु पेरिस समझौता क्या है?
जलवायु पेरिस समझौता क्या है?

 

  1. संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन अभिसमय ( United Nations Con vention on Climate Change UNFCC ) द्वारा यह लक्ष्य निर्धारित किया गया था कि वर्ष 1850 की तुलना में विश्व के औसत तापमान में 2 ° C से अधिक की बढ़ोत्तरी को रोका जाएगा , क्योंकि 2 प्रतिशत से अधिक तापमान की बढ़ोत्तरी से जलवायु परिवर्तन के घातक परिणाम सामने आने लगेंगे . पेरिस समझौते में विश्व के औसत तापमान में 2 ° C के लक्ष्य को  बाध्यकारी तथा वाणित लक्ष्य 1.5 ° C कर दिया गया है |
  2. जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों का  सामना करने के लिए कमजोर  देशों की क्षमताओं का विकास किय जाएगा स्वच्छ ऊर्जा के साधनों को इसी रूप में अपनाया जाएगा कि उनसे खाद्यान्न के उत्पादन अथवा देशों की खाद्यान्न सुरक्षा पर विपरीत प्रभाव न हो सके |
  3. पेरिस समझौते में इस बात को स्वीकार किया गया है कि कार्बन रहित स्वच्छ ऊर्जा के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त वित्तीय साधनों की उपलब्धता को बनाए रखना आवश्यक है . इसके लिए विकसित देशों द्वारा प्रतिवर्ष 100 बिलियन डॉलर की धनराशि विश्व जलवायु कोष में उपलब्ध कराई जाएगी विकसित देशों का यह योगदान नितान्त स्वैच्छिक है |
  4. समझौते में यह भी व्यवस्था की गई है । कि प्रत्येक पक्षकार स्वेच्छा से निर्धारित किए गए अपने कार्बन कटौती के लक्ष्यों को प्रस्तुत करेगा तथा सन्धि पर हस्ताक्षर होने के बाद उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करेगा इन स्वैच्छिक लक्ष्यों को सन्धि की भाषा में राष्ट्र द्वारा निर्धारित लक्षित योगदान ( Intended ) Nationally Determined Contri bution INDC ) के नाम से जाना जाता है| लेकिन यदि कोई पक्षकार अपने लक्ष्यों को प्रभावी ढंग से प्राप्त नहीं कर पाता है , तो सन्धि में उसके विरुद्ध कार्यवाही के लिए बाध्यकारी प्रावधान नहीं है | इन लक्ष्यों की उपलब्धियों की वर्ष 2023 के बाद समीक्षा की जाएगी तथा यदि कोई कमी पाई जाती है , तो उसके लिए नए कदम उठाए जाएंगे .

जलवायु पेरिस समझौता क्या है?

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पेरिस समझौते की राह मुश्किल  है:-

यद्यपि परिस समझौते से जलवायु परिवर्तन की समस्या पर नियन्त्रण लगाने की आस बंधी थी , लेकिन इसको व्यवहारिक रूप देने में जो कठिनाइयो सामने आ रही कठिनाइयाँ निम्नवत् है:- 

  1. अपनी पेरिस समझौते के लिए सबसे पहली व बड़ी चुनौती अमरीका ने प्रस्तुत की है . 2017 में सत्ता में आने के बाद अमरीका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी अमरीका पहले नीति के अन्तर्गत पेरिस समझौते से अलग होने की घोषणा कर दी . यह पेरिस समझौते के लिए एक बड़ा झटका है उल्लेखनीय है कि अमरीका विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के साथ साथ प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन की मात्रा की दृष्टि से भी पहले स्थान पर है . यद्यपि अन्य धनी व यूरोपीय देशों ने पेरिस समझौते को लागू करने की प्रतिबद्धता को दोहराया है लेकिन क्या अमरीका की भागीदारी के बिना पेरिस समझौता अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होगा ? अमरीका ऐसा पहली बार नहीं कर रहा है अमरीका ने इसी तरह 1997 के क्योटो जलवायु समझौते पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था । इसमें यह व्यवस्था की गई थी कि जलवायु परिवर्तन की समस्या का समाधान करने के उद्देश्य से विकसित देश 2008 और 2012 के बीच अपने यहाँ ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 1990 की तुलना में 5 प्रतिशत कटौती करेंगे . क्योटो प्रोटोकाल के अन्तर्गत यूरोपीय संघ के देशों को 8 प्रतिशत , अमरीका 4 को 7 प्रतिशत तथा जापान को 6 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन में कटौती करनी थी . अन्तत क्योटो समझौता अपने लक्ष्य की पूर्ति के बिना ही समाप्त हो गया क्या पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते का भी इस क्योटो समझौते की तरह ही होगा ? यह विश्व समुदाय के लिए चिन्ता का विषय है |
  2. दूसरी बाधा यह है कि पेरिस समझौते में गरीब व विकासशील देशों के . जलवायु परिवर्तन प्रयासों में वित्तीय मदद के लिए एक वैश्विक जलवायु परिवर्तन कोष की स्थापना की घोषणा की गई थी . इस कोष में धनी व विकसित देशों के योगदान से 100 बिलियन डॉलर की राशि जमा की जानी है . इसमें अमरीका का योगदान भी शामिल है लेकिन गत तीन वर्षों का अनुभव बताता है कि कई विकसित देश इसके लिए अतिरिक्त धनराशि देने के पक्षधर नहीं हैं . ये देश पहले से ही विकासशील देशों को दी जा रही अपनी विकास सहायता राशि की गणना इस प्रस्तावित कोष में कर रहे हैं . इससे उन्हें जलवायु परिवर्तन के लिए कोई अतिरिक्त धनराशि नहीं देनी पड़ेगी . इस चालाकी के कारण गरीब व विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन के लिए कोई अतिरिक्त वित्तीय सहायता नहीं प्राप्त हो सकेगी . यहाँ यह भी समझना आवश्यक है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए नए उपायों की तकनीकी अत्यन्त महँगी है तथा विकसित देशों की कम्पनियाँ इस प्रकार की तकनीकी की पूरी कीमत लेना चाहती हैं . वित्तीय संसाधनों तथा नई तकनीकी के अभाव में गरीब देश कहाँ तक जलवायु परिवर्तन उपायों को अपना पाएंगे , यह शंका का विषय है |
  3. पेरिस समझौते के मार्ग में तीसरी बाधा ( इस समझौते की प्रकृति में ही निहित है . इस समझौते के अन्तर्गत विभिन्न देशों ने अपनी प्रतिबद्धताओं के प्रस्ताव प्रस्तुत किए हैं , उनका पालन करना स्वैच्छिक है . इन पर कोई बाध्यकारी शक्ति नहीं है . यदि कोई देश अपने द्वारा दिए गए स्वैच्छिक आश्वासनों को पूरा नहीं करता है , तो उसके लिए समझौते में कोई बाध्यकारी व्यवस्था नहीं की गई है . इसमें दिक्कत यह है कि सम्प्रभु देशों पर इस प्रकार की बाध्यता लागू करना कठिन है . निष्कर्षतः , पेरिस समझौते को लागू करना देशों की इच्छा पर निर्भर करता है |
  4. 1992 से ही जलवायु परिवर्तन के वैश्विक प्रयासों में साझी विशेषीकृत जिम्मेदारी के सिद्धान्त ( Common But Differentiated Responsibility ) को स्वीकार किया गया था . इसका तात्पर्य है कि पर्यावरण संरक्षण में विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों की जिम्मेदारी अधिक होगी , क्योंकि वे ऐतिहासिक दृष्टि से पर्यावरण प्रदूषण के लिए अधिक उत्तरदायी हैं . ये देश विकासशील देशों की तुलना में दायित्व निर्वहन हेतु | अधिक सक्षम भी हैं इस सिद्धान्त को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 1992 में स्वीकृत जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का फ्रेमवर्क अभिसमय ( United ) Nations Framework Convention on Climate Change – UNFCCC ) में भी शामिल किया गया था . लेकिन गत 26 वर्षों में इस सिद्धान्त को विकसित देशों द्वारा निरन्तर कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है . पेरिस समझौते में भी इसे महत्व नहीं दिया गया . विकासशील व गरीब देशों का मानना है कि वर्तमान पर्यावरण प्रदूषण तथा कार्बन उत्सर्जन में विकसित देशों की ऐतिहासिक जिम्मे दारी ( Historical Responsibility ) है तथा उन्हें जलवायु परिवर्तन प्रयासों में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन की दृष्टि से आज भी विकसित देश कार्बन उत्सर्जन में सबसे आगे हैं . लेकिन विकसित देश जलवायु परिवर्तन के प्रयासों में सभी देशों की बराबर भूमिका के पक्षधर हैं . विकासशील देशों की दूसरी समस्या उनकी विकास चुनौतियाँ हैं . अगर वे नए जलवायु परिवर्तन उपायों को अपनाते हैं | तो उनका विकास बाधित होगा . विकसित देशों की इस प्रकार की चुनौती का सामना नहीं करना पड़ रहा है , क्योंकि वे विकास का एक न्यूनतम स्तर प्राप्त कर चुके हैं . इन मतभेदों के आलोक में विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन उपायों के लिए प्रेरित करना एक बड़ी चुनौती है |

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